जब हमने पहली बार काफी पी
यह
किस्सा 1968 के आसपास का है। हम लोग हरिद्वार में साहित्य− रतन की परीक्षा देने के
लिए गए हुए थे। 25 दिसंबर के आसपास की बात होगी। एक दिन मेरे और साथी खुशीराम
सिंह के दिमाग में कॉफी पीने की आई। हमने कभी कॉफी पी नहीं थी ,पर दिमाग में आई ,तो
काफी पीने के लिए निकल गए। बाजार में घूमते हुए खुशीराम सिंह और मुझे एक दुकान
दिखाई दी । दुकान पर बोर्ड लगा था −चाय
कॉफी मिलती है। यह देखकर हम दुकान में पहुंच गए और दुकानदार को कॉफी बनाने का
आर्डर दिया। खुशीराम मेरे से बहुत ही निकट थे । मैं उनका कहना मानता था। दुकानदार
ने पूछा −काफी-कप में बनाऊं या गिलास में ।खुशीराम
सिंह ने उत्तर दिया −गिलास में बनाओ और धीरे से मेरे से बोले− गिलास में कप से
ज्यादा कॉफी आएगी ,इसलिए कहा है। खैर दुकानदार गिलास में दूध में कॉफी डालकर चम्मच
से उसे काफी देर तक चलता रहा फिर उसने काफी तैयार कर काफी के दोंनों गलास हमें पकड़ा दिए। काफी के गिलासों में चम्मच पड़े थे ,उन्हें देखकर मास्टर खुशीराम
सिंह बोले− लगता है यह काफी तो चम्मच से पी जाती है ।मैंने कभी कॉफी पी
नहीं थी ,अतः समझ नहीं आया कि कैसे पी जाएगी, किंतु खुशीराम सिंह की बात में तर्क
लगा कि यदि चम्मच से नहीं पी जाती तो गिलास में चम्मच क्यों डाली है ,उधर यह भी लग
रहा था यदि चम्मच से ना पी जाती होगी तो चम्मच से पीते देख दुकान में बैठे ग्राहक
हमें अनाड़ी समझ कर मजाक उड़ाएंगे। खैर दुकान में बैठे अन्य ग्राहकों के इधर-उधर
देखने पर हमने चम्मच से कॉफी पीना शुरू की। काफी बहुत गर्म थी। गर्म होने के कारण चम्मच
से काफी पीना संभव नहीं था ,उधर काफी का टेस्ट बहुत खराब था ।ऐसा लग रहा था जैसे हुक्के का कई दिन का रखा पानी पीना पड़ा हो।
दो-तीन चम्मच पीने के बाद लगने लगा कि इसे पीने के दौरान तो उल्टी हो जाएगी ।अकल
ने कुछ काम किया। मैंने दुकान वाले से दो कप मांगे। उसने कहा कि गिलास
में काफी ज्यादा देर गरम रहती है। उसनें हमें दो कप पकड़ा दिए ।हमने कप में काफी करने के
दौरान दुकानदार के पैसे का भुगतान किया। दिसंबर का महीना था इस दौरान कुछ समय ही
बीतने से काफी बिल्कुल ठंडी हो गई ।हमने आपस में सलाह की उल्टी ना हो जाए इसलिए इस
काफी को एक घूंट में पीकर जल्दी से दुकान से उतरो। उल्टी हो तो रास्ते में हो। एक
घूंट में काफी पीकर हम झपटकर दुकान से उतरकर सड़क पर आ गए ।उल्टी तो नहीं हुई
किंतु जी बहुत देर तक मिचलाता रहा ।
इस
घटना को कई दशक बीत गए ।अब तुम तो मध्यम श्रेणी के परिवारों में कॉफी बनाना और पीना
आम बात हो गई ।किंतु जीवन में पहली बार कॉफी पीने की स्मृति आज तक दिमाग से नहीं
निकली।
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