अखबार का टाईटिल
अखबार का टाईटिल
नहटौर जैन कालेज में
पढ़ाने के दौरान वहां के प्रधानाचार्य के नजदीकी एक शिक्षक ने मुझे बहुत परेशान
किया।वह चाहता था इंटर में पढ़ने वाले उसके लड़के को मैं संस्कृत में गाइड करूं।मैंने उनसे कहा कि मेरा पांचवा पीरियड
खाली होता है।वे अपने बेटे को चौथा पीरियड
बीतने पर कालेज बुला लें। मैं इंटरवल और पांचवे पीरियड में उसे गाइड कर दिया करूंगा।
उन्होंने कहा कि उनका बेटा कालेज में नही
आएगा। मैंने कहा कि स्कूल के अवकाश के बाद मैं
कालेज के हिंदी प्रवक्ता सीपी शर्मा की बेटी को उनके घर पढ़ाता हूं। वहां
अपने लड़के को भेज दिया करें। उसने कहा कि
वह वहां भी नही आएगा। ऐसे में मैंने असमर्थता जता दी।कहा कि मैं रोज झालू से आता जाता
हूं।इसलिए उसे पढ़ाना मेरे लिए संभव नही है।
मेरे उत्तर से
झल्लाकर उसने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया।कभी कहता −अपने हेडक्वार्टर पर रहने
का पता आफिस में लिखवाओ। कभी प्रिंसीपल से उल्टी −सीधी शिकायत करता। ज्यादा होने पर
मैंने एक दिन कह दिया कि मैं नहटौर रहना
शुरू कर दूंगा, पर तेरे बेटे को नही पढ़ाऊंगा।
इसी दौरान मेरी समझ
में आया कि इन सबका उपाए अखबार निकालना है।अखबार निकालने से इन ज्यादतियों का पर्दाफाश
हो सकता है।मैंने साप्ताहिक समाचार पत्र निकालने का निर्णय लिया। पत्र के लिए
न्यूज पेपर रजिस्ट्रार के यहां आवेदन किया किंतु काफी दिन बाद भी वहां से उत्तर
नही आया। मैंने नगर के एक सीनियर पत्रकार से
इसका जिक्र किया1 यह मेरे साथ दिल्ली चलने
को तैयार हो गए।वे एक स्थानीय दैनिक स्वतंत्र आवाज में सहायक संपादक थे।राजकीय
सेवा से सेवानिवृत होकर पत्रकारिता कर रहे थे।वे और मैं ट्रेन से दिल्ली पंहुच गए। चांदनी चौक में अखबार के
पेपर के एक सप्लायर के यहां अपने बैग रखे।यहां से ही साथी पत्रकार के अखबार के लिए पेपर
जाता है ।समय था तो घूमने निकल गए।साथी पत्रकार घूमाते −घूमाते एक जगह ले गए।उस जगह को दिखाकर इन्होंने कहा कि जानते हो−
यह क्या जगह है।मैने कहा कि नहीं।वे बोले यह जीबी रोड है।मैने पूछा तो क्या खास
बात है ।उन्होंने कहाकि उपर देखो।मैने ऊपर देखा कि डपर कमरे
की खिड़की से कुछ औरत नींचे झांक रही हैं।मैने कहाकि ये कौन हैं।उन्होंने कहा कि
ये जो औरते ऊपर से नीचें झांक रही हैं, ये वेश्याएं है।ऊपर इन वैश्याओं के कोठें हैं। यहां नीचे बाजार भरता है।
उनकी यह बात सुनकर
मरे होश उड गए।दिमाग में आया कि कोई तेरे कस्बे झालू का यहां मिल गया तो क्या होगा।वह
क्या कहेगा। मैंने घबराहट में जेब से रूमाल निकाल कर इस तरह मुंह पर रख लिया कि चेहरा
किसी की पहचान में न आए।
मेरे साथी पत्रकार
ने पास के पान के खोखे की साइड में खड़े एक व्यक्ति से बात की।वह जीने पर चढ़ने
लगे।वे मुझे भी अपने साथ ले जाने लगे।मैंने मना कर दिया।कहा कि वह हो आएं। मैं यहीं खड़ा हूं।
समाज सुधार के बारे में बड़ी −बडी बाते करने
वाले मेरे साथी वरिष्ठ पत्रकार कोठे पर
चले गए।मैं खोखे के पास बरांडे में एक
पिलर की ओर मुंकर इस तरह खड़ा हो गया, कि वहां कोई मेरे कस्बे झालू का घूम रहा हो तो
मुझे न पहचाने।
साथी पत्रकार
कब और
कितनी देर में आए, ये तो मुझे पता नही,किंतु मैने इतना जरूर महसूस किया,कि
इस बींच बहुत लंबा समय बीत गया।मेरा दिल बहुत बुरी तरह से धडक रहा था। मुझे इस समय मे पसीने छूट रहे थे। इस दौरान यदि कोई व्यक्ति मेरे कंधे
पर हाथ रखकर पूछ लेता− कौन हो1 यहां कयों खड़े हो तो यह निशचित कि मेरा हार्ट फेल हो जाता।
खैर पत्रकार साथी
लौटकर मेरे पास आ गए। उन्हे कितनी देर लगी, मुझे नही पता।मुझे तो इतना लगा कि घंटो
, महीनों और सालों गुजर गए हों।हम दोनों
चलने लगे।वह बोले की वह कुछ करने नही सिर्फ घूमने गए थे।वे ऊपर जाकर लडकियों को देखकर चले आए, उन्होंने ऊपर कुछ किया
और नही किया, मुणे पता नही।मैं तो
सिर्फ इतना जानता हूं कि उन पत्रकार महोदय
के साथ का आधा या पौन घंटों का यह समय मुझपर बहुत भारी पड़ा।
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