Posts

Showing posts from January, 2025

खाने के तंबाकू से बनी चाय

    जैन विद्या मंदिर इंटर कॉलेज नहटौर में शिक्षण कार्य का मेरा डेढ़ वर्ष मेरे जीवन के कई रोचक अनुभव समेटे   है। इस शहर में काफी संपन्न लोग रहते हैं ।कुछ तो बहुत ऊंची जगह पर तैनात हैं। एक ऐसे ही परिवार का लड़का कॉलेज में इंटर में पढ़ता था। लड़के और उसके परिवार के बारे में ज्यादा तो याद नहीं ,किंतु यह बताते थे कि उस लड़के के पिता लखनऊ राज्यपाल निवास में किसी ऊंचे पद पर थे।   एक दिन इस परिवार में कॉलेज के पढ़ने वाले   छात्र का जन्मदिन था। उसने कॉलेज के सारे स्टाफ को शाम चार बजे नाश्ते पर आमंत्रित किया। हम सब उसके घर गए।   नाश्ता बहुत अच्छा था ।बहुत करीने से मेज पर नाश्ता सजाया गया था। नाश्ते की व्यवस्था एक भव्य हाल में थी । हाल और उसकी सजावट के देखकर   लगता था कि परिवार पुराने रईसों का है ।हम लोगों ने आराम से नाश्ता किया। नाश्ते के   साथ   चाय थी ।चाय पीते समय लगा कि इसमें खाने का तंबाकू मिला है। क्योंकि बड़े लोगों के यहां दावत थी और परिवार के सदस्य हाल में मौजूद होकर   नाश्ता कर रहे थे , अतः चाय पीने वाले हम सब सोचते रहे कि बड़े लो...

जब हमने पहली बार काफी पी

    यह किस्सा 1968 के आसपास का है। हम लोग हरिद्वार में साहित्य− रतन की परीक्षा देने के लिए गए हुए थे।     25 दिसंबर के   आसपास की बात होगी। एक दिन मेरे और साथी खुशीराम सिंह के दिमाग में कॉफी पीने की आई। हमने कभी कॉफी पी नहीं थी ,पर दिमाग में आई ,तो काफी पीने के लिए निकल गए। बाजार में घूमते हुए खुशीराम सिंह और मुझे एक दुकान दिखाई दी । दुकान   पर बोर्ड लगा था −चाय कॉफी मिलती है। यह देखकर हम दुकान में पहुंच गए और दुकानदार को कॉफी बनाने का आर्डर दिया। खुशीराम मेरे से बहुत ही निकट थे । मैं उनका कहना मानता था। दुकानदार ने पूछा −काफी-कप   में बनाऊं या गिलास में ।खुशीराम सिंह ने उत्तर दिया −गिलास में बनाओ और धीरे से मेरे से बोले− गिलास में कप से ज्यादा कॉफी आएगी ,इसलिए कहा है। खैर दुकानदार गिलास में दूध में कॉफी डालकर चम्मच से उसे काफी देर तक चलता रहा फिर उसने काफी   तैयार कर   काफी के दोंनों गलास हमें   पकड़ा दिए। काफी के गिलासों   में चम्मच पड़े थे ,उन्हें देखकर मास्टर खुशीराम सिंह बोले−   लगता है यह काफी   तो चम्मच से पी ज...

अखबार का टाईटिल

  अखबार का टाईटिल   नहटौर जैन कालेज में पढ़ाने के दौरान वहां के प्रधानाचार्य के नजदीकी एक शिक्षक ने मुझे बहुत परेशान किया।वह चाहता था इंटर में पढ़ने वाले उसके लड़के को मैं   संस्कृत में   गाइड करूं।मैंने उनसे कहा कि मेरा पांचवा पीरियड खाली होता है।वे अपने बेटे को चौथा पीरियड   बीतने पर कालेज बुला लें। मैं   इंटरवल और पांचवे पीरियड में उसे गाइड कर दिया करूंगा। उन्होंने   कहा कि उनका बेटा कालेज में नही आएगा। मैंने कहा कि स्कूल के अवकाश के बाद मैं   कालेज के हिंदी प्रवक्ता सीपी शर्मा की बेटी को उनके घर पढ़ाता हूं। वहां अपने लड़के को भेज दिया करें।   उसने कहा कि वह वहां भी नही आएगा। ऐसे में मैंने असमर्थता जता दी।कहा कि मैं रोज झालू से आता जाता हूं।इसलिए उसे पढ़ाना मेरे लिए संभव नही है। मेरे उत्तर से झल्लाकर उसने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया।कभी कहता −अपने हेडक्वार्टर पर रहने का पता आफिस में लिखवाओ। कभी प्रिंसीपल से उल्टी −सीधी शिकायत करता। ज्यादा होने पर मैंने एक दिन कह दिया कि मैं   नहटौर रहना शुरू कर दूंगा, पर तेरे बेटे को नही पढ़ा ...